मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

खामोश, मीडिया शोध जारी है!

  1. हेमंत जोशी


आजकल मीडिया ही मीडिया की खबर देता है। समाचारों में मीडिया से जुड़े समाचार पर्याप्त से कहीं ज्यादा मिल जाते हैं। लेकिन पिछले महीने दिल्ली के मेरिडियन होटल में चार दिन तक देश और विदेश के अनेक संचार विशेषज्ञ, मीडिया के अनेक संपादक और संचारकर्मी, बड़ी संख्या में मीडिया प्रशिक्षक और प्रशिक्षार्थी ‘मीडिया, लोकतंत्र और प्रशासन’ जैसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा करते रहे, लेकिन देश के अंग्रेजी या भारतीय भाषाओं के किसी अख़बार या टेलीविज़न चैनल ने विस्तार से इसके समाचार देने की परवाह नहीं की। कारण शायद यह भी है कि सामान्यत: ऐसी संगोष्ठियों के समाचार तब कुछ विस्तार से छपते हैं जब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, आदि उनका उद्घाटन करें। दुनिया भर में शायद यही रिवाज है।

अगर यह मान भी लें कि यही रिवायत है तो भी समाचार-पत्रों के संपादकीय पृष्ठों पर तो कुछ लेख ऐसे अवसरों पर दिख ही जाने चाहिए। कुछ विभिन्न सत्रों की रिपोर्टिंग भी हो जाए तो अनेक लोगों को इसका लाभ इसलिए भी मिल सकता है कि अब मीडिया केवल पत्रकारों और संचार विशेषज्ञों के जानने-समझने की चीज नहीं रह गया है। आम पढ़े-लिखे या जनतंत्र में भागीदारी करने वाले इंसान को भी इस तरह की सामग्री का लाभ मिलना चाहिए। एक तऱफ तो हम स्कूल के पाठ्यक्रम में मीडिया को एक विषय के तौर पर पढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं, दूसरी तरफ मीडिया के बारे में विभिन्न माध्यमों में केवल बेहद महत्वपूर्ण या उथली और सनसनीखेज ख़बरें ही लोगों को मिल पाती हैं।

भले ही लोकतंत्र और प्रशासन से मीडिया के संबंधों पर समाचार माध्यमों में गाहे-बगाहे लेख छपते रहते हैं, लेकिन देश-विदेश के विद्वानों के इस विषय में विचार जानने का मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले नागरिकों के पास कोई साधन नहीं हैं। हा, पुस्तकालयों में उन्हें अनेक पुस्तकें मिल सकती हैं।

आजकल अगले सौ दिन में शिक्षा का स्वरूप बदलने को लेकर काफी अधिक शोर है। यशपाल समिति की रिपोर्ट आने के बाद शिक्षा में होने वाले संभावित परिवर्तनों के बारे में शिक्षा मंत्री के बयान आए हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण कदम 1986 में उठाया गया था। उस समय अंतिम दस्तावेज़ जारी किए जाने से पहले देश भर में अनेक संगोष्ठिया हुईं थी, अलग-अलग स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्ता की कमान संभालते ही कुमारमंगलम बिड़ला और अनिल अंबानी के नेतृत्व में कुछ बुद्धिजीवियों से भविष्य की शिक्षा नीति पर दस्तावेज तैयार करवाया था। यहा इस बात का जिक्र इसलिए आवश्यक है कि हम जनतंत्र और प्रशासन के बीच की कड़ी को देख सकें और इस बात की भी जाच कर सकें कि इन दोनों को अधिक या कम जनतांत्रिक बनाने में मीडिया की क्या भूमिका होती है। जब देश में शिक्षा दिन-ब-दिन महगी होती जा रही है, शिक्षा का स्तर गिरता दिखाई पड़ रहा है और सरकार बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय, आई.आई.टी. और मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय ले रही है, तब पुरानी संस्थाओं को समाप्त करके एक नई समेकित संस्था बनाने का विचार तो नेक है, लेकिन वह कहा तक व्यावहारिक है इस पर विचार करने की आवश्यकता है। किसी भी राष्ट्रीय स्तर के विमर्श में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी मीडिया के बिना संभव नहीं है।
विश्व भर में आजकल सुशासन की जो अवधारणा बनी है, उसमें नागरिक समाज की भागीदारी पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अनेक स्तरों पर देश-विदेश में स्वयंसेवी संगठन ऐसे कई काम कर रहे हैं, जो सरकारों को करने चाहिए। इसके अलावा अनेक संस्थाए एवं लोग विभिन्न सामाजिक मुद्दों की वकालत और प्रचार के काम में भी लगे हुए हैं। एक समय था, जब लॉबिंग करना अच्छा नहीं माना जाता था, लेकिन आजकल यह सकारात्मक काम माना जाने लगा है। सरकारें भी नीतियां बनाने के लिए संबंधित लोगों से व्यापक तौर पर विचार-विमर्श करती हैं। कई बार तो ऐसी नीतियों का जि सरकारें संचार माध्यमों के जरिए इसलिए भी करती हैं ताकि जनता के मूड़ को भापा जा सके।

इसके विपरीत सरकारों के कई निर्णयों पर जब जनाक्रोश उभर कर आता है तो मीडिया उस पर आम बहस का माहौल तैयार करता है, जिसके फलस्वरूप कई बार सरकारों को अपने निर्णय वापस लेने पड़ते हैं या उन पर फिर से विचार करने को बाध्य होना पड़ता है। आरक्षण का मुद्दा हो, कोल्ड ड्रिंक्स में जहरीले पदार्थो का मामला हो या हाल ही में समलैंगिक लोगों की आजादी का मसला हो, यह सभी जनतंत्र और प्रशासन में मीडिया की भूमिका को रेखांकित करते हैं। ऐसे माहौल में मीडिया शोध चुपचाप अकेले क्यों हो और लोगों को इसकी जानकारिया भी क्यों न मुहैया करवाई जाए? sabhar-hindustan

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